Sat. Dec 5th, 2020
shayri

कितनी भयावह होती है, ना बुढ़ापे की ये बेड़ियां,
जिसको जकड़ ले उसके शरीर से जिंदगी को चूस बाहर कर देती है।
उस इंसान को सूखा दरख़्त सा कर देती है,
ना कोई पंछी उसके पास आ चहचहाते हैं….
ना सर्द ना गर्म ना बसंत उस पर अब कोई असर डालती है….
ना उगता हुआ सूरज उसकी बेजान से जिंदगी में कोई उम्मीद भर पाता है ,
वो भी हर ऋतु में बस ठूंठ सा खड़ा रहता है, चुपचाप एक रोज किसी तूफान में वो खत्म हो जाना चाहता है…..
बेसहारा बेबस कितना तन्हा हो जाता है ना वो उम्र के इस दौर में ,यह दौर उसे उतना नहीं मारता जितना उसमें कुछ जिंदगी, कुछ उम्मीदें ,अभी बाकी होते हुए भी उसके अपनों का उसे बेजान मान लेना, बेकार मान लेना पल-पल मारता हैं ….
क्यों होता है ऐसा,जैसे बचपन, जवानी, जिंदगी का एक पड़ाव है ऐसे बुढ़ापा भी तो जिंदगी का एक हिस्सा है ,फिर इसका मंजर इतना भयावह क्यों होता है ….
हमारे बड़े बूढ़े कहते हैं कि बुढ़ापे में इंसान बच्चा सा हो जाता है ,मगर जिंदगी से मैंने जितना देखा है यह तो सरासर झूठ है, खुद को सहानुभूति देने वाला एक झूठ,
बचपन में तो बच्चे के आसपास जिंदगी खुशियां खिलखिलाते रहती है,
हर कोई उसे देखने के लिए उसे छूने के लिए इंतजार करता है ,
मगर बुढ़ापे में तो उसके आसपास कोई नहीं होता सिर्फ अंधेरा और बेबसी के साथ के सिवा,
उसे छोड़ दिया जाता है अंधेरे कमरे में जिंदगी से कोसों दूर,
खैर छोड़िए,
खुद के विचारों ने भी अंत में एक प्रश्न छोड़ दिया है, मेरे पास भी नहीं है मेरी बेचैनी का जवाब मैंने सुना है कि इंसान एहसान उतारता जरूर है फिर इस उम्र भर के एहसान को क्यों भूल जाता है ,वो कहते हैं कि बच्चे मां-बाप का दर्पण होते है ….जहां आज वो है कल मैं भी तो हो सकता हुँ,
” बुढ़ापा अभिशाप तो नहीं है मगर शायद हम लोगों ने आज इसे बना दिया है”

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Written By Namita Verma

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