Mon. Oct 26th, 2020
zzz

मुझे ड़र लगता है अकेलेपन से
एक अज़ीब सी आवाज़ पड़ती है कानों में।

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भारी हो जाता है कभी-कभी मेरा मन
कोई दवा नही मिलती इसकी दवाखानों में।

आज दहलीज़ पार की तो मालूम हुआ
क्यों वक्त बिताते हैं लोग मैखानों में।

गज़ब का मजा है पीके जमीन पर लेटने में
सुकून ही नही मिलता आजकल ऊंचे मकानों में।

बस तुम साथ रहना दोस्तों हमेशा मेरे
फिर मय्यत के बाद भी रौनक होगी शमशानों में।

लोग तराशते हैं कोहिनूर कहीं-कहीं
देखो ! हीरे भी मिल जाते हैं कोयले की खानों में।


Stark….

mmm

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